शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

घर-स्कूल का फासला मिटाने को क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा, प्रदेश के ज्यादातर परिषदीय स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे घर और अपने आसपास के परिवेश में आंचलिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं

घर-स्कूल का फासला मिटाने को क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा, प्रदेश के ज्यादातर परिषदीय स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे घर और अपने आसपास के परिवेश में आंचलिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं

लखनऊ : बुंदेलखंड अंचल में जिसे छेरी कहते है और अवधी भाषा में छगड़ी, उसे परिषदीय स्कूलों की हंिदूी पाठ्यपुस्तकों में बकरी लिखा जाता है। ब्रज भाषा में मेंढक को मेंडुका तो पूर्वांचल के कुछ अंचलों में बेंग कहते हैं। घर से निकलकर पहली बार परिषदीय स्कूलों का रुख करने वाले बच्चे स्थानीय बोली और हंिदूी भाषा के शब्दों के अंतर के इस जाल में उलझकर स्कूल से कहीं मुंह न मोड़ लें, बेसिक शिक्षा विभाग इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए पहल करने जा रहा है।

प्रदेश के ज्यादातर परिषदीय स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे घर और अपने आसपास के परिवेश में आंचलिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। स्कूल में दाखिला लेने पर किताबों में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली से वे अनभिज्ञ होते हैं। शुरुआत में किताबों की शब्दावली उन्हें बोङिाल और अजनबी लगती है। इस वजह से कई बार बच्चों का पढ़ाई से मन उचट जाता है और वे स्कूल आना छोड़ देते हैं। घर की चहारदीवारी से निकल कर स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए परिवेश का यह बदलाव सुखद हो और वे इसे आत्मसात कर सकें, इसके लिए क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा लिया जा रहा है। परिषदीय विद्यालयों की पहली कक्षा में दाखिला लेने वाले बच्चों की सहूलियत के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रदेश की चार आंचलिक भाषाओं-भोजपुरी, अवधी, बुंदेलखंडी और ब्रज में बच्चों को भाषा की बुनियादी जानकारी देने वाली किताबें तैयार करायी हैं। प्रत्येक भाषा की किताब में पशु-पक्षियों के नाम और उनकी बोलियां, फल व सब्जियां, खाद्य पदार्थ, घरेलू वस्तुएं, विभिन्न क्रियाओं से जुड़े शब्द, परिवेशीय शब्द, पारिवारिक रिश्ते, कहानियां और कविताएं आंचलिक भाषा में उपलब्ध हैं और साथ में हंिदूी में उनका अनूदित रूप भी।
चारों क्षेत्रीय भाषाओं में किताबें तैयार कराने की जिम्मेदारी इलाहाबाद स्थित राज्य शिक्षा संस्थान को सौंपी गई थी जिसने उनका ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। बेसिक शिक्षा निदेशक डॉ.सर्वेद्र विक्रम बहादुर सिंह ने बताया कि तैयार करायी गईं किताबों की प्रति क्षेत्रवार स्कूलों के शिक्षकों को उपलब्ध करायी जाएंगी ताकि वे बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत कर सकें। इससे शिक्षकों को भी फायदा होगा। मसलन कई बार पूर्वांचल के निवासी शिक्षक की तैनाती बुंदेलखंड में हो जाती है। ऐसी स्थिति में शिक्षक के लिए भी बच्चों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली क्षेत्रीय भाषा को समझना मुश्किल होता है। यह प्राइमर एक पंथ दो काज का काम करेगी।

घर-स्कूल का फासला मिटाने को क्षेत्रीय भाषाओं का सहारा, प्रदेश के ज्यादातर परिषदीय स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे घर और अपने आसपास के परिवेश में आंचलिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं Rating: 4.5 Diposkan Oleh: news